अय्याम ग़दीरी

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ग़दीर की घटना

हम यहाँ सभी रिवायतों के पेशेनज़र ग़दीर की घटना का सारांश करते हैं (हालांकि यह अर्ज़ कर दिया जाए कि कुछ रिवायतों में यह घटना विस्तार और कुछ में संक्षेप में बयान हुई है, कुछ में घटना के एक पहलू और कुछ में किसी अन्य पहलू की ओर इशारा हुआ है, चुनांचे इन सभी रिवायतों का खुलासा यह है।

पैग़म्बरे इस्लाम (स) के जीवन का अंतिम वर्ष था "अलविदाई हज" के समारोह जितने प्रतिष्ठित और सम्मानजनक हो सकते थे वह पैग़म्बरे अकरम की हमराही में समाप्त हुए, सब के दिल अध्यात्म समर्पित थे अभी उनकी आत्मा इस महान इबादत का मानवी रमणीय स्वाद महसूस कर रही थी। असहाबे पैग़म्बर की भारी संख्या पैग़म्बरे इस्लाम (स) के साथ आमाले हज अंजाम देने की महान सआदत पर बहुत खुश नजर आ रही थी।

पैग़म्बर के साथियों की संख्या कुछ की निगाह में 90 हज़ार और कुछ की निगाह में एक लाख बारह हजार और कुछ की निगाह में एक लाख बीस हजार और कुछ की निगाह में एक लाख चौबीस हजार है। न केवल मदीना के लोग इस यात्रा में पैग़म्बर के साथ थे बल्कि अरब प्रायद्वीप के अन्य हिस्सों के मुसलमान भी महान ऐतिहासिक पुरस्कार एवं गौरव प्राप्त करने के लिए आप के साथ थे।

सरज़मीने हिजाज़ का सूरज दर एवं दीवार और पहाड़ों पर आग बरसा रहा था लेकिन इस यात्रा की बेनजीर आध्यात्मिक मिठास सभी तकलीफों को आसान बना रही थी। सूर्य पतन (ज़वाले आफताब) का समय निकट था, धीरे धीरे "जोहफ़ह" की धरती और उसके बाद सूखे और जलाने वाले "ग़दीरे ख़ुम" का बयाबान नजर आने लगा।

दरअसल यहां एक चौराहे जो हिजाज़ के लोगों को एक दूसरे से अलग करता है, उत्तरी रास्ता मदीने की तरफ़ दूसरा पूर्वी रास्ता इराक़ की तरफ़, तीसरा पश्चिमी देशों एवं मिस्र की ओर तथा चौथा दक्षिणी रास्ता सरज़मीन यमन को जाता है यही वह स्थान है जहां अंतिम और इस महान यात्रा का महत्वपूर्ण उद्देश्य अंजाम दिया जाना था और पैग़म्बर मुसलमानों के सामने अपनी अंतिम एवं महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के आधार पर अंतिम आदेश पहुँचाना चाहते थे।

गुरुवार का दिन था और हिजरत का दसवाँ साल, आठ दिन ईदे कुर्बान को बीते थे कि अचानक पैग़म्बर की ओर से सभी को ठहर ने का आदेश दिया गया, मुसलमानों ने ज़ोर की आवाज़ से क़ाफ़िले से आगे चले जाने वाले लोगों को वापस बुलाया और इतनी देर तक रुके रहे कि पीछे आने वाले लोग भी पहुंच गए। सूर्य मध्याह्न रेखा (ख़त्ते निस्फ़ुन्नहार= Meridian line) से गुजर गया तो पैग़म्बर के मुअज्जिन ने "अल्लाहु अकबर" की सदा के साथ लोगों को ज़ोहर की नमाज पढ़ने के लिए आमंत्रित किया, मुसलमान जल्दी जल्दी नमाज़ पढ़ने के लिए तैयार हो गए, लेकिन वातावरण इतना गर्म था कि कुछ लोग अपनी अबा का कुछ हिस्सा पैरों के नीचे और शेष सिर पर रखने के लिए मजबूर थे अन्यथा बयाबान की गर्म रेत और सूरज की किरणें उनके सिर और पैरों को कष्ट दे रही थीं।

इस रेगिस्तान में कोई साया नजर नहीं आता था और न ही कोई सब्ज़ा या घास केवल कुछ सूखे जंगली पेड़ थे जो गर्मी का सख्ती के साथ मुकाबला कर रहे थे कुछ लोग इन्हीं चन्द पेड़ों का सहारा लिए हुए थे, उन्होंने इन निर्वस्त्र पेड़ों पर कपड़ा डाल रखा था और पैग़म्बर के लिए एक सायबान बना रखा था लेकिन सूरज की जला देने वाली गर्म हवा इस सायबान के नीचे से गुजर रही थी, बहरहाल ज़ोहर की नमाज़ अदा की गई।

मुसलमान नमाज़ के बाद तुरंत अपने छोटे छोटे टेंट में जाकर शरण लेने की चिंता में थे लेकिन रसूलुल्लाह ने उन्हें आगाह किया कि वह सब के सब सर्वशक्तिमान ख़ुदा का एक नया संदेश सुनने के लिए तैयार हो जाएँ जिसे एक विस्तृत ख़ुत्बा के साथ बयान किया जाएगा।

जो लोग रसूलुल्लाह (स) से दूर थे वह इस महान सभा में पैग़म्बर का मलकूती और नूरानी चेहरा नहीं देख पा रहे थे तो ऊंट के पालानों का मिम्बर बनाया गया, पैग़म्बर मिम्बर पर तशरीफ़ ले गए, पहले परवरदिगारे आलम की हम्द व प्रशंसा बजा लाए और अल्लाह पर भरोसा करते हुए यूं संबोधित किया: मैं जल्द ही ख़ुदावन्देमुतआल के निमंत्रण पर लब्बैक कहते हुए तुम्हारे बीच से जाने वाला हूँ, में भी जवाबदेह हूँ और तुम लोग भी जवाबदेह हो, तुम मेरे बारे में क्या कहते हो? सब लोगों ने ज़ोर की आवाज़ में कहा:

"हम गवाही देते हैं कि आपने रिसालत की जिम्मेदारी अंजाम दी और शुभचिंतक का दायित्व बजालाये तथा हमारी हिदायत के रास्ते में प्रयास व कोशिश की, अल्लाह आप को जज़ाए खैर दे" इसके बाद आपने फ़रमाया: क्या तुम लोग अल्लाह की एकता, मेरी रिसालत और क़यामत की सत्यता और उस दिन मरे हुओं के कब्र से निकाले जाने की गवाही नहीं देते?
सबने कहा: क्यों नहीं हम सब गवाही देते हैं।
आप ने फरमाया: ख़ुदाया! गवाह रहना।
आप ने फिर कहा: ऐ लोगो! क्या तुम मेरी आवाज़ सुन रहे हो?
उन्होंने कहा: जी हाँ।

उसके बाद सारे बयाबान पर सन्नाटे का आलम तारी हो गया, सिवाय हवा की सनसनाहट के कोई चीज़ सुनाई नहीं देती थी, पैग़म्बर ने कहा: देखो! मैं तुम्हारे बीच दो गिराँकद्र चीज़ें बतौर यादगार छोड़े जा रहा हूँ तुम उनके साथ क्या व्यवहार करोगे?

उपस्थित लोगों में से एक व्यक्ति ने पुकार कर कहा या रसूलल्लाह (स) वह दो गिराँकदर चीजें कौनसी हैं?

तो पैग़म्बरे अकरम ने कहा: पहली चीज़ तो अल्लाह की किताब है जो सिक़्ले अकबर है, उसका एक सिरा परवरदिगारे आलम के हाथ में है और दूसरा सिरा तुम्हारे हाथ में है, उससे हाथ न हटाना वरना तुम भटक जाओगे, दूसरी गिराँकदर यादगार मेरे अहले बैत हैं और मुझे ख़ुदाए लतीफ व ख़बीर ने खबर दी है कि यह दोनों एक दूसरे से अलग न होंगे यहाँ तक कि स्वर्ग में मुझसे आ मिलेंगे।

उन दोनों से आगे बढ़ने (और उनसे तजाउज़ करने) की कोशिश न करना और न ही उन से पीछे रहना कि इस स्थिति में भी तुम हलाक हो जाओगे।

अचानक लोगों ने देखा कि रसूलुल्लाह अपने आसपास नज़र दौड़ा रहे हैं जैसे किसी को खोज रहे हैं जूंही आपकी नज़र हज़रत अली अलैहिस्सलाम पर पड़ी तुरंत उनका हाथ पकड़ लिया और उन्हें इतना बुलंद किया कि दोनों की बग़लों की सफेदी दिखने लगी और सब लोगों ने उन्हें देखकर पहचान लिया कि यह तो इस्लाम का वही सिपहसालार है कि जिसने कभी हार का मुंह नहीं देखा।

उस अवसर पर पैग़म्बर की आवाज काफी अधिक स्पष्ट और बुलंद होगई और आपने इरशाद फरमाया:

’’أیُّھا النَّاس مَنْ أولیٰ النَّاسِ بِالمَؤمِنِیْنَ مِنْ أنْفُسِھم‘‘

ऐ लोगो! बताओ वह कौन है जो सभी लोगों की तुलना में मोमिनीन पर खुद उनसे ज़्यादा औलवियत रखता है? इस पर सब उपस्थित लोगों ने ब यक आवाज़ जवाब दिया कि अल्लाह और उसका रसूल बेहतर जानते हैं।

तो पैग़म्बर ने फरमाया: अल्लाह मेरा मौला और रहबर है और मैं मोमिनीन का मौला एवं रहबर हूँ और मैं उनकी तुलना खुद उनसे ज़्यादा अधिकार रखता हूँ (और मेरा इरादा उनके इरादे पर मुक़द्दम है)। उसके बाद फ़रमाया:

’’فَمَن کُنْتُ مَولَاہُ فَہذَا عَلِيّ مَولاہ‘‘

"अर्थात मैं जिस का मौला हूँ अली भी उसके मौला और रहबर हैं"

पैग़म्बरे अकरम ने इस वाक्य को तीन बार दुहराया, और कुछ रावियों के अनुसार पैग़म्बर ने यह वाक्य चार बार दुहराया और उस के बाद आसमान की तरफ सिर ऊंचा करके बारगाहे ख़ुदावंदी में कहा:

"َللّٰھُمَّ وَالِ مَنْ وَالاٰہُ وَعَادِ مَنْ عَادَاہُ وَأحب مَنْ أحبہُ وَ ابغِضْ مَنْ أبغَضہُ وَ انْصُرْ مَنْ نَصَرُہُ وَاخْذُلْ مَنْ خَذَلَہُ، وَأدرِ الحَقّ مَعَہُ حَیْثُ دَارَ"

यानी ख़ुदाया! जो इसे दोस्त रखे तू उसे दोस्त रख और जो इससे दुश्मनी रखे तू उससे दुश्मनी रख, जो इसे चाहे तू उससे चाहत रख और जो इससे कपट रखे तू उससे कपट रख, जो इसकी सहायता करे तू उसकी सहायता कर, जो इसकी मदद से किनारा कशी करे तू उसे अपनी मदद से महरूम रख और हक़ को उधर मोड़ दे जिधर यह रुख करे।

उसके बाद फ़रमाया:

"ألَا فَلْیُبَلِّغ الشَّاہدُ الغائبَ"

"सभी उपस्थित लोग आगाह हो जाएँ कि यह सब की जिम्मेदारी है कि वह इस बात को उन लोगों तक पहुंचाएं जो यहां पर इस समय मौजूद नहीं हैं"

पैग़म्बर का खुत्बा समाप्त हो गया पैग़म्बर पसीने में सराबोर थे हज़रत अली अलैहिस्सलाम भी पसीना में डूबे थे, अन्य सभी उपस्थित लोगों के भी सिर से पैर तक पसीना बह रहा था। अभी इस मजमे की पंक्तियाँ एक दूसरे से अलग नहीं हुई थीं कि जिबरईले अमीन वही लेकर नाज़िल हुए और पैग़म्बर को इन शब्दों में धर्म (दीन) के परिपूर्ण होने की बशारत दी:

’’الْیَوْمَ أکْمَلْتُ لَکُمْ دِینَکُمْ وَأتْمَمْتُ عَلَیْکُمْ نِعْمَتِی‘‘

"आज के दिन हमने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म और संविधान को परिपूर्ण कर दिया और अपना वरदान तुम पर पूरा कर दिया"

वरदान पूरा होने का संदेश सुनकर पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया:

"اللّٰہُ أکبرُ اللّٰہُ أکبرُ عَلیٰ إکْمَالِ الدِّینِ وَإتْمَام النِعْمَةِ وَرَضیٰ الربِّ بِرسَالَتِي وَالوِلاٰیَة لِعَليّ مِنْ بَعْدِي"

"हर प्रकार की बुज़ुर्गी व बड़ाई खुदा ही के लिए है कि जिस ने अपने धर्म को परिपूर्ण किया और अपना वरदान हम पर पूरा किया और मेरी नबूवत व रिसालत और मेरे बाद अली की विलायत के लिए खुश हुआ।"

पैग़म्बर की मुबारक ज़बान से अमीरुल मोमिनीन अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम की विलायत का ऐलान सुनकर उपस्थित लोगों में बधाई का शोर बुलंद हुआ लोग बढ़ चढ़ कर इस सम्मान व पद पर हज़रत अली को अपनी ओर से बधाई पेश करने लगे चुनांचे प्रसिद्ध व्यक्तियों में से हज़रत अबू बकर और हज़रत उमर की ओर से बधाई के ये शब्द इतिहास के पन्नों में सुरक्षित हैं कि उन्होंने कहा:

لک یا بن أبِي طالب أصبحتَ وَأمسیتَ مولاي و مولاکُلّ مؤمن و مؤمنةٍ"

"बधाई हो बधाई! ऐ अबू तालिब के पुत्र कि आप मेरे और सभी साहिबाने ईमान पुरुषों और स्त्रियों के मौला व रहबर होगए"।

तब इब्ने अब्बास ने कहा: बख़ुदा यह अहद व पैमान सब की गर्दन में बाकी रहेगा। उस अवसर पर प्रसिद्ध कवि हस्सान बिन साबित ने पैग़म्बरे इस्लाम (स) से अनुमति मांगी कि इस मौके की मुनासिबत से कुछ शेर कहूं, चुनांचे उन्होंने यह मशहूर व मारूफ़ शेर पढ़े:

یَنادِیْھِمْ یَومَ الغَدِیرِ نَبِیُّھُمْ بِخُمٍّ وَأسْمِعْ بِالرَّسُولِ مُنَادِیاً
فَقَالَ فَمَنْ مَولٰاکُمْ وَنَبِیُّکُمْ؟ فَقَالُوا وَلَمْ یَبْدُو ھُناکَ التَّعامِیا
إلٰھکَ مَولانَا وَأنتَ نَبِیُّنَا َولَمْ تَلْقِ مِنَّا فِي الوَلایَةِ عَاصِیاً
فَقَالَ لَہُ قُمْ یَا عَليّ فَإنَّنِی رَضِیْتُکَ مِنْ بَعْدِي إمَاماً وَ ھَادیاً
فَمَنْ کُنْتُ مَولاہُ فَھَذَا وَلِیُّہُ فَکُونُوا لَہُ اَتْبَاعَ صِدْقٍ مَوَالِیاً
ھَنَاکَ دَعَا اَللّٰھُمَّ وَالِ وَلِیَّہُ وَکُنْ لِلَّذِي لَہُ أتْبَاعَ عَلِیًّا مُعَادِیاً

यानी "पैग़म्बरे अकरम (स) ग़दीरे खुम के दिन यह घोषणा कर रहे थे और वास्तव में कितनी महान घोषणा थी।

फ़रमाया: तुम्हारा मौला और नबी कौन है? तो मुसलमानों ने साफ साफ कहा:

"आप का ख़ुदा हमारा मौला है और आप हमारे नबी हैं, हम आपके विलायत के आदेश का विरोध नहीं करेंगे"

उस समय पैग़म्बरे अकरम (स) ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम से फ़रमाया या अली उठो, क्योंकि मैं ने तुम को अपने बाद इमाम और हादी नियुक्त किया है।

उसके बाद फ़रमाया जिस का मैं मौला एवं आक़ा हूँ उसके यह अली मौला और रहबर हैं, इसलिए तुम सच्चे दिल से इसकी इताअत व पैरवी करना।

उस समय पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: पालने वाले! इसके दोस्त को दोस्त रख! और इसके दुश्मन को दुश्मन।

इन शेरों को अहले सुन्नत के बड़े बड़े उलेमा ने नक़्ल किया है जिनमें से हाफिज "अबू नईम इस्फ़हानी" हाफिज "अबू सईद सजिस्तानी", "ख़्वारज़मी मालिकी" हाफिज "अबू अब्दुल्ला मर्ज़बानी", "गंजी शाफई", "जलालुद्दीन सियूती", "सिब्ते इबन जौज़ी" और "सदरुद्दीन हमवीनी" का नाम लिया जा सकता है विद्वान पाठको! यह था अहले सुन्नत और शिया उलमा की किताबों में बयान होने वाली मशहूर हदीसे ग़दीर का खुलासा।